मेवाड़ के वीर योद्धा महाराणा प्रताप (Mewar ke veer yoddha Maharana Pratap)
हिंदुस्तान का शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो मेवाड़ के वीर योद्धा शूरवीर महाराणा प्रताप के बारे में नहीं जानता हो। महाराणा प्रताप मेवाड़ क्षेत्र के सिसोदिया राजपूत राजवंश के ऐसे राजा थे जिनका नाम इतिहास के पन्नों में अपनी वीरता और दृढ़ प्रण के लिए हमेशा के लिए अमर है और रहेगा। महाराणा प्रताप ऐसे वीर योद्धा थे जिन्होंने कभी भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की और जब तक जीवित रहे तब तक संघर्ष करते रहे लेकिन कभी भी मुगलों के सामने नहीं
झुकें। महाराणा प्रताप क्रूर मुगल शासक अकबर के मुख्य शत्रु थे क्योंकि महाराणा प्रताप ने मुगलों को कई बार युद्ध में पटखनी दी थी और अकबर अपने शासन काल में कभी भी महाराणा प्रताप से जीत नहीं पाया।
परिचय
मेवाड़ के वीर योद्धा महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को सिसोदिया राजवंश परिवार में हुआ था। महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदय सिंह एवं माता रानी जयवंत कंवर थी। महाराणा प्रताप के जन्म स्थान को लेकर कुछ विरोधाभास है कुछ इतिहासकार और लेखक महाराणा प्रताप का जन्म स्थान मेवाड़ के कुंभलगढ़ को मानते हैं तो कुछ इतिहासकार महाराणा प्रताप की जन्मस्थली पाली के राज महलों को बताते हैं। हालाँकि तथ्यों के आधार पर महाराणा प्रताप का जन्मस्थान कुंभलगढ़ ही माना गया।
महाराणा प्रताप जयन्ती की 2 तारीखें
अंग्रेजी
कैलेंडर के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ में हुआ
था लेकिन राजस्थान में राजपूत समाज उनका जन्मदिन हिंदू तिथि के अनुसार
मनाते हैं । महाराणा प्रताप का जन्म हिंदू तिथि के अनुसार जेष्ठ शुक्ल की
तृतीया तिथि को हुआ था इसलिए राजपूत समाज महाराणा प्रताप का जन्मदिन जेष्ठ
महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाता है।
बचपन का नाम
महाराणा प्रताप जब छोटे थे तब उनका अधिकतर समय भीलों के साथ बीता था, भीलो के साथ ही वह युद्ध कला सीखते थे। उस समय भील अपने पुत्र को कीका कह कर संबोधित करते थे। भील प्रताप को भी कीका नाम से ही पुकारते थे इसीलिए महाराणा प्रताप का बचपन में नाम कीका पड़ गया था।
महाराणा प्रताप को कैसे मिली राजगद्दी
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फरवरी 1572 को राणा उदय सिंह ने अपने देहांत से पहले अपनी सबसे छोटी रानी से
हुुये उनके नौवें पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। उनके
इस निर्णय से जनता प्रसन्न नहीं थी जिसके चलते उदयसिंह की मृत्यु के कुछ समय
बाद महाराणा प्रताप को राजगद्दी पर बिठा दिया गया। इतिहासकारों के अनुसार
प्रताप के मामा अखई राज और ग्वालियर के राम सिंह ने प्रताप को राणा बनने के
लिए मनाया और उनका राज्याभिषेक किया था।
महाराणा प्रताप की रानियां और बच्चें
महाराणा प्रताप ने कुल 11 शादी की थी जिससे उनकी कुल 11 रानियां थी और उन सभी से महाराणा प्रताप के पुत्र भी थे। महाराणा प्रताप की पहली शादी 1557 में 17 वर्ष की आयु में चावण्ड के
राव माम्रक सिंह की पुत्री अजबदे पंवार से हुई थी।
महाराणा प्रताप की रानियां और उनसे हुए पुत्रों के नाम
1. महारानी अजबदे पंवार से अमरसिंह और भगवान दास
2. फूलबाई राठौर से चंदा सिंह और शेख सिंह
3 अमर बाई राठौर से नाथा सिंह
4 शहमति बाई हाड़ा से पूरा सिंह
5 अलमदेबाई चौहान से जसवंत सिंह
6 रत्नावती बाई परमार से माल सिंह, गज और क्लिंगु
7 लखाबाई से रायभान सिंह
8 जसोबाई चौहान से कल्याणदास
9 चंपाबाई जंथी से कल्ला, सनवाल दास सिंह और दुर्जन सिंह
10 सोलनखिनीपुर बाई से साशा और गोपाल
11 खीचर आशाबाई से हत्थी सिंह और राम सिंह
महाराणा प्रताप के उत्तराधिकारी
महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद उनके और महारानी अजबदे पंवार के पुत्र अमर सिंह महाराणा प्रताप के उत्तराधिकारी नियुक्त हुए थे।
महाराणा प्रताप का भाला, कवच और तलवारें
इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था और उनका पीतल और तांबे से बना कवच 72 किलो का था। इनके अलावा महाराणा प्रताप लगभग 20-20 किलो की 2 तलवारें हमेशा साथ रखते थे। महाराणा प्रताप का भाला, कवच, तलवारें और ढाल मिलाकर 208 किलो वजनी थे जिन्हें वो साथ लेकर लड़ते थे।
महाराणा प्रताप का भाला
कोई पूछे कितना था राणा का भाला
तो कहना कि अकबर के जितना था भाला
जो पूछे कोई कैसे उठता था भाला
बता देना हाथों में ज्यों नाचे माला
चलाता था राणा जब रण में ये भाला
उठा देता पांवों को मुग़लों के भाला
जो पूछे कभी क्यों न अकबर लड़ा तो
बता देना कारण था राणा का भाला
महाराणा प्रताप 2 तलवारें क्यों रखते थे
महाराणा प्रताप एकमात्र ऐसा योद्धा थे जिनमें यह खूबी थी कि वह अपने शत्रु के लिए भी एक तलवार हमेशा अपने साथ रखते थे।महाराणा प्रताप को उनकी मां जयवंता बाई ने नसीहत दी थी कि कभी निहत्थे शत्रु पर वार मत करो उसे अपनी अतिरिक्त तलवार दो और फिर ललकारो। इस कारण महाराणा प्रताप हमेशा अपने साथ 2 तलवार रखते थे ताकि यदि सामने वाला शत्रु निहत्था भी हो तो उन्हें अपनी एक तलवार दे सके।
महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक
महाराणा प्रताप का नीलवर्ण घोड़ा चेतक एक अरबी घोड़ा था जो गुजरात के एक व्यापारी द्वारा लाया गया था। यह व्यापारी काठियावाड़ी नस्ल के तीन घोड़े चेतक त्राटक और अटक लेकर मारवाड़ आया था। महाराणा प्रताप ने युद्ध क्षमता के अनुसार घोड़ों की परीक्षा ली थी जिसमें अटक मारा गया था। शेष दो घोड़ों में से चेतक ज्यादा फुर्तीला और बुद्धिमान था जिसके कारण महाराणा प्रताप ने मुंह मांगी कीमत चुका कर चेतक को अपने पास रख लिया। मेवाड़ सेना के श्रेष्ठ अश्व प्रशिक्षकों ने तथा महाराणा प्रताप स्वयं ने भी चेतक को प्रशिक्षित किया था। चेतक ने महाराणा प्रताप के साथ मिलकर कई लड़ाइयां लड़ी और जितायी थी। कहा जाता है कि चेतक इतना समझदार और फुर्तीला था कि महाराणा प्रताप की आँख की पुतली के इशारों से ही समझ जाता और तुरंत आदेश का पालन कर देता था।
चेतक के मुंह पर लगाई जाती थी हाथी की सूंड
चेतक घोड़े की एक खास बात यह भी थी कि महाराणा प्रताप उसके चेहरे पर हाथी का मुखौटा लगाकर रखते थे ताकि युद्ध मैदान में दुश्मनों के हाथियों को कंफ्यूज किया जा सके।
चेतक ने बचाई थी महाराणा प्रताप की जान
जब हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप घायल हो गए थे तो, चेतक की एक टांग टूटी होने के बावजूद वह भागकर महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र से दूर ले जाकर उनकी जान बचाई थी।
चेतक महाराणा प्रताप को दूर ले जाते समय एक 26 फीट के दरिया को भी एक छलांग में पार कर गया था और जब तक दौड़ता रहा तब तक कि राणा प्रताप को सुरक्षित स्थान पर नहीं ले गया। हल्दीघाटी युद्ध में चेतक भी घायल हुआ था लेकिन बावजूद उसके वह प्रताप को एक सुरक्षित स्थान पर ले गया। अधिक घायल होने के कारण और रक्त स्त्राव होने के कारण चेतक अंत में वीरगति को प्राप्त हो गया था।
हल्दीघाटी क्षेत्र में आज भी चेतक की समाधि बनी हुई है।
महाराणा प्रताप का हाथी
महाराणा प्रताप के चेतक घोड़े के अलावा एक प्रिय हाथी भी था जिसका नाम था राम प्रसाद। यह हाथी अपने स्वामी भक्ति और विलक्षण प्रतिभाओं के लिए प्रसिद्ध था, रामप्रसाद हाथी इतना ताकतवर और समझदार था कि हल्दीघाटी के युद्ध में उसने अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था। अकबर ने जब चढ़ाई की थी तब दो ही चीजों को बंदी बनाने की मांग की थी एक तो खुद महाराणा प्रताप और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद।
रामप्रसाद को बंदी बनाने के लिए सात बड़े हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उस पर 14 महावतो को बिठाया गया था। रामप्रसाद को बंदी बनाने के बाद अकबर के सामने पेश किया गया जहा अकबर ने उसका नाम बदलकर वीरप्रसाद रख दिया। मुगलों ने उसको खाने के लिए गन्ने और फल दिए लेकिन रामप्रसाद इतना स्वामी भक्त था कि उसने मुगलों के दिये खाने को खाना तो दूर उनकी तरफ देखा तक नहीं। 18 दिनों तक रामप्रसाद भूखा प्यासा रहा और अंत में वीरगति को प्राप्त हो गया।
रामप्रसाद की मौत पर अकबर ने कहा था कि " जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं चुका पाया उस महाराणा को मैं क्या झुका पाऊंगा"।
महाराणा प्रताप के वीर योद्धा
महाराणा प्रताप के वीर योद्धाओं में प्रमुख नाम भील सेना के सरदार राणा पूंजा
का आता है, सरदार राणा पूंजा का हल्दीघाटी युद्ध में बहुत ही महत्वपूर्ण
योगदान रहा था। भोमट के राजा राणा पूंजा ने अपनी गरासिया सेना के साथ
हल्दीघाटी के युद्ध में मुगलों को छठी का दूध याद दिला दिया था। इनकी युद्ध
प्रणाली बहुत ही उम्दा थी उनके हथियारों में भाले, तलवार और तीर कमान थे।
महाराणा प्रताप की तरफ से एक मुस्लिम सरदार भी थे जिन्होंने हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा था वह मुस्लिम सरदार हकीम खां सूरी
थे। शेरशाह सूरी के खानदान से संबंध रखने वाले हकीम खां सूरी ने अपने 1500 सैनिकों के साथ महाराणा प्रताप की सेना में शामिल हुए और मुगल सेना के
खिलाफ युद्ध लड़ा था। हल्दीघाटी के युद्ध में हकीम खां सूरी वीरगति को
प्राप्त हुए थे लेकिन मरते दम तक उनके हाथ की तलवार नहीं छूटी थी मरणोपरांत भी
उन्हें इसी तलवार के साथ दफनाया गया था।
इनके अलावा बिंदा के झालामान
भी महाराणा प्रताप के योद्धाओं में शामिल थे जिन्होंने अपने प्राणों का
बलिदान करके हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की थी।
महाराणा प्रताप के वीर योद्धाओं में एक नाम रणथंभौर के सेनापति भारमल के बेटे भामाशाह का नाम भी आता है जोकि एक बहुत ही कुशल योद्धा और प्रशासक थे। हल्दीघाटी के युद्ध में भामाशाह ने अपने भाई ताराचंद
के साथ मिलकर मुगल सेना को पछाड़ा था यही नहीं भामाशाह ने अकबर के शासन
वाले मालवा में धावा बोलकर उसको जीता था। भामाशाह ने 20 लाख रुपए और सोने की 12 हजार मुहरे महाराणा प्रताप के राजकोष में जमा करवाई थी।
हल्दीघाटी क्षेत्र भारतीय इतिहास में वह प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थान है जहां पर मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप ने अपनी मातृभूमि की लाज बचाए रखने के लिए अनेक युद्ध लड़े और अपने शौर्य का प्रदर्शन किया। यह वही स्थान है जहां पर असंख्य मुगल सैनिकों को मेवाड़ की सेना ने मौत के घाट उतारा था।
हल्दीघाटी कौन से जिले में है
हल्दीघाटी राजस्थान राज्य के राजसमंद जिले में स्थित है। हल्दीघाटी के पास ही कुंभलगढ़ का जगत प्रसिद्ध किला है जहां पर महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। हल्दीघाटी के निकट ही नाथद्वारा में प्रसिद्ध श्रीनाथ जी का मंदिर भी स्थित है।
हल्दी घाटी कहां स्थित है
अरावली पर्वतमाला श्रंखला में खमनोर एवं बलीचा गांव के मध्य एक पहाड़ी दर्रा के रूप में है । हल्दीघाटी का मुख्य युद्ध स्थल रक्त तलाई खमनोर गांव के मध्य में स्थित है जहां अब शहीदों की स्मृति में अनेक छतरियां बनी हुई है। हल्दीघाटी राजस्थान के उदयपुर जिले से लगभग 43 किलोमीटर उत्तर पश्चिम दिशा में और नाथद्वारा से लगभग 11 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है।
हल्दीघाटी क्षेत्र में मिट्टी का रंग हल्दी के समान पीला है इसी कारण इस क्षेत्र को हल्दीघाटी कहा जाता है।
हल्दीघाटी क्यों प्रसिद्ध है
हल्दीघाटी शूरवीर महाराणा प्रताप और मुगल राजा अकबर के बीच हुए युद्ध के कारण प्रसिद्ध है। हल्दीघाटी युद्ध में मुगलों की तरफ से आमेर के राजा मानसिंह प्रथम ने युद्ध का नेतृत्व किया था। हालांकि महाराणा प्रताप की सेना ने ही हल्दीघाटी में युद्ध किया लेकिन महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के मुख्य युद्ध स्थल रक्त तलाई खमनोर में युद्ध किया था।
हल्दीघाटी युद्ध कब लड़ा गया
हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 शुक्रवार के दिन लड़ा गया था।
सेना की ताकत या सैन्य शक्ति
इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप की सेना की संख्या 20000 थी वही मान सिंह के पास 80000 लोगों की मजबूत सेना सेना थी । वहीं कुछ इतिहासकारों के अनुसार मेवाड़ की सेना में 5000 सैनिक तो वही मुगल की सेना में 20000 सैनिक थे। दोनों ही सेनाओं के पास युद्ध के लिए घोड़े और हाथी थे लेकिन मेवाड़ी सेना के पास गोला-बारूद और तोपे नहीं थी। गोला बारूद और तोपे केवल मुगल सेना के पास ही थी कुछ मुगल सैनिकों के पास बंदूकें भी थी। वही महाराणा प्रताप की सेना में अस्त्र-शस्त्र में केवल भाले, बर्छिया, तलवारें और तीर-कमान ही थे।
हल्दीघाटी युद्ध
हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को सूर्योदय के 3 से 4 घंटे बाद शुरू हुआ था। शुरुआत में हल्दीघाटी दर्रे के पास युद्ध शुरू हुआ लेकिन मुगलों का नेतृत्व कर रहे आमेर के राजा मानसिंह जानते थे कि पूरी सेना को हल्दीघाटी दर्रे में लेकर जाना उचित नहीं है इसलिए वह अपनी सेना को खमनोर में रोके रखा। हालांकि कुछ समय पश्चात खुद महाराणा प्रताप खमनोर में पहुंच गए और मेवाड़ी सेना और मुगलों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। युद्ध शुरू होते ही मेवाड़ की सेना में इतनी शक्ति से आक्रमण किया कि एक बार तो पूरी मुगल सेना तितर-बितर हो गई इस युद्ध में मेवाड़ की सेना की हर रणनीति सफल हो रही थी। महाराणा प्रताप की सेना में राणा पूंजा के नेतृत्व में भीलो की सेना भी लड़ रही थी जो अपनी अनोखी युद्ध प्रणाली के लिए जानी जाती थी। 4 घंटे तक यह भीषण युद्ध चलता रहा जिसमें मेवाड़ के अनेक सैनिक घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन अपनी सैन्य शक्ति कम होने के बावजूद मेवाड़ की सेना ने मुगलों कि अधिकतर सेना को समाप्त कर दिया। 4 गुना सैन्य शक्ति होने के बावजूद भी मुगल सैनिक मेवाड़ की सेना को जितना नुकसान नहीं पहुंचा पाए उससे कहीं ज्यादा नुकसान खुद मुगल सेना को हुआ था।
महाराणा प्रताप ने एक ही वार में तलवार से कर दिए थे 2 टुकड़े
हल्दीघाटी युद्ध में मुगल सेना का सेनानायक बहलोल खा एक बहुत ही ताकतवर और जालिम सेनानायक था। जब उसका सामना महाराणा प्रताप से हुआ था तो महाराणा प्रताप ने एक ही झटके में बहलोल खान को दो भागों में काट दिया इस बात से आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि महाराणा प्रताप में कितनी शक्ति थी।
हल्दीघाटी युद्ध मे कौन जीता
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि हल्दीघाटी के युद्ध में दोनों तरफ की सेनाओं को बड़ा नुकसान हुआ लेकिन यह युद्ध जीत के किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंचा ।
महाराणा प्रताप ने जीता था हल्दीघाटी का युद्ध
इतिहासकारों ने भले ही यह बताया कि इस युद्ध का अंतिम निर्णय नहीं निकला लेकिन रिसर्च में यह बात सामने आई है कि हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप ने जीता था।
महाराणा प्रताप की जीत के प्रमाण
- शोधकर्ता डॉ चंद्रशेखर शर्मा ने ताम्रपत्र से जुड़े प्रमाण बताएं उनके अनुसार युद्ध के बाद अगले 1 साल तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आसपास के गांव में भूमि के पट्टों को ताम्रपत्र के रूप में जारी किया था। इन ताम्रपत्र पर एकलिंग नाथ के दीवान प्रताप के हस्ताक्षर थे उस समय भूमि के पट्टे जारी करने का अधिकार सिर्फ राजा को ही था जो इस बात का प्रमाण है कि प्रताप की जीत हुई थी तभी वह स्थान मुगलों के अधीन नहीं हुआ और महाराणा प्रताप ही राज कर रहे थे।
- अन्य शोधकर्ताओं ने भी हल्दीघाटी युद्ध में यही प्रमाण दिए की महाराणा प्रताप की ही जीत हुई थी क्योंकि इस युद्ध के बाद मुगल सेना की तरफ से लड़ने वाले सेनापति मानसिंह और आसिफ खां से, युद्ध के नतीजों के कारण अकबर नाराज हुआ था और दोनों को 6 महीने तक दरबार में ना आने की सजा दी गई थी यह भी महाराणा प्रताप की जीत का प्रमाण है।
- महाराणा प्रताप अकबर के सबसे बड़े विरोधी थे क्योंकि उन्होंने अकबर की कभी भी अधीनता स्वीकार नहीं की थी यदि हल्दीघाटी में मुगल सेना जीती होती तो अकबर अपने सबसे बड़े विरोधी प्रताप को हराने वाले को पुरुस्कृत जरूर करते लेकिन ऐसा नहीं हुआ जो यह भी इस बात को स्पष्ट करता है कि महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के युद्ध में विजय प्राप्त की थी।
सरदार झाला मन्ना का बलिदान
इस युद्ध में मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप भी काफी घायल हो गए थे और मुगल सेना राणा प्रताप को घेर रही थी। राणा प्रताप के पास जाने की हिम्मत मुगल सैनिकों में नहीं थी लेकिन उनके दूर से दिखते मुकुट के कारण मुगल सेना उनको निशाना बना रही थी। ऐसे में सरदार झाला मन्ना ने खुद राणा का मुकुट पहन लिया और घायल महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र से बाहर भेज दिया। मुगल सेना ने झाला मन्ना जी को राणा समझकर निशाना बनाना शुरू किया हालांकि सरदार झाला मन्ना बहुत देर तक संघर्ष करते रहे लेकिन अंत में वह वीरगति को प्राप्त हुए। इस तरह झाला मन्ना ने अपने प्राणों का बलिदान देकर महाराणा प्रताप और स्वतंत्र मेवाड़ की आस को जीवित रखा।
अपराजेय रहे महाराणा प्रताप
एक समय आया जब महाराणा प्रताप पूरी तरह से निराश हो गए थे यह बात जब मेवाड़ के भामाशाह को पता चली, तो उन्होंने महाराणा प्रताप को हिम्मत दी और महाराणा के लिए अपने खजाने के भंडार खोल दिए। भामाशाह बचपन से ही मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के मित्र सहयोगी और सबसे विश्वासपात्र सलाहकार थे साथ ही उनके खजांची भी थे।
भामाशाह की मदद बहुत ही कारगर सिद्ध हुई जिससे महाराणा प्रताप ने फिर से सेना तैयार की । भामाशाह की मदद के कारण चित्तौड़ को आजाद कराने का संकल्प बहुत मजबूत हो गया महाराणा प्रताप ने वीरता के बल पर धीरे-धीरे मेवाड़ के सभी दुर्गों पर दोबारा अपना आधिपत्य जमा लिया। अकबर दुबारा चित्तौड़ को जीतने की तैयारी करता रहा लेकिन वह फिर कभी विजय नहीं हो सका और महाराणा प्रताप हमेशा और पराजय रहे।
महाराणा प्रताप की मृत्यु कब और कैसे हुयी
महाराणा प्रताप अपने अंतिम समय में अपनी राजधानी चावंड में ही निवासरत थे। अपनी राजधानी चावंड में जब वे धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा रहे थे तब एकाएक उनकी आंत में खिंचाव आ गया। बाद में चावंड में उनका इलाज चला लेकिन 29 जनवरी 1597 को 57 वर्ष की आयु में आंत में आए खिंचाव के चलते महाराणा प्रताप सर्वदा के लिए इस लोक को छोड़कर स्वर्ग लोग चले गए।
महाराणा प्रताप की मौत पर अकबर भी रोया
महाराणा प्रताप का जब स्वर्गवास हुआ तब उस समय अकबर लाहौर में था। वहां उसे जब महाराणा प्रताप के मृत्यु के समाचार मिले तब अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आंखों में आंसू आ गए थे। अकबर जानता था की भले ही उस का सबसे बड़ा शत्रु महाराणा प्रताप रहे लेकिन महाराणा प्रताप ने कभी भी मेवाड़ की शान को अकबर के सामने नहीं झुकने दिया चाहे उन्होंने अपना यश और राज्य ही गवा दिया फिर भी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।
महाराणा प्रताप का स्मारक मेवाड़ के महाराणा भगवत सिंह ने महाराणा प्रताप और उनके वफादार घोड़े चेतक की याद में बनवाया था। यह स्मारक मोती मगरी जिसे पर्ल हिल भी कहा जाता है की चोटी पर स्थित है। यह स्मारक फतहसागर झील के पास बना हुआ है जिससे फतेहसागर झील साफ दिखाई देती है। इस स्मारक में कुछ महान पेंटिंग भी है जो राजघरानों के शौर्य और महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़ी घटनाओं को दर्शाती है।
महाराणा प्रताप पर फिल्म और सीरियल
शूरवीर महाराणा प्रताप पर सबसे पहले 1946 में जयंत देसाई ने निर्देशन करते हुए महाराणा प्रताप नाम से एक ब्लैक एंड वाइट फिल्म बनाई। सन 2013 में सोनी टीवी ने भारत का वीर पुत्र महाराणा प्रताप नाम से एक धारावाहिक प्रसारित किया था।





जय मेवाड़
ReplyDeleteBahut achha lekhan
ReplyDeleteMaharana pratap ki jay.
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