दोस्तों आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ
तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे
के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला
जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे। जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है, जो यज्ञ और उपवीत दो शब्दों से मिलकर बना है।
शास्त्रों के अनुसार हिंदू धर्म में 24 संस्कार बताए गए हैं जिनमें 16 प्रधान संस्कार और 8 उप संस्कार है यज्ञोपवीत धारण करना इन 24 संस्कारों में से एक है जिसे उपनयन संस्कार के रूप में जाना जाता है।
शास्त्रों के अनुसार हिंदू धर्म में 24 संस्कार बताए गए हैं जिनमें 16 प्रधान संस्कार और 8 उप संस्कार है यज्ञोपवीत धारण करना इन 24 संस्कारों में से एक है जिसे उपनयन संस्कार के रूप में जाना जाता है।
जनेऊ या यज्ञोपवित मे होते है तीन सूत्र
जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं जो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक भी माने गए है साथ ही यह सत्व, रज और तम केे प्रतीक भी माने गए है। यह तीन सूत्र गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक और यह तीन आश्रमों का प्रतीक भी है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।
जनेऊ या यज्ञोपवित के एक तार में होते है 9-9 तार
यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वार मिलाकर कुल नौ द्वार शरीर में होते हैं।
जनेऊ या यज्ञोपवित मे लगायी जाती है पांच गांठ
यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। इन्हें पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का प्रतीक भी माना जाता है।
जनेऊ या यज्ञोपवित की लंबाई (Janeu ki Lambayi)
यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि शामिल हैं।
जनेऊ या यज्ञोपवित में कितने धागे होते हैं
शास्त्रों के अनुसार यज्ञोपवित में 6 धागे होते हैं जिनमें तीन धागे स्वयं धारण करने वाले के और तीन धागे पत्नी के बताए गए हैं। ब्रह्मचारी व्यक्ति और अविवाहित व्यक्ति की जनेऊ में तीन धागे ही होते हैं।
कौन कौन पहन सकते है जनेऊ और क्या लडकिया पहन सकती है जनेऊ
वैदिक धर्म में प्रत्येक आर्य(हिन्दू) का कर्तव्य है कि वह जनेऊ पहने और उसके नियमों का पालन करे। प्रत्येक आर्य (हिन्दू) जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।
ब्राह्मण को जनेऊ धारण करना अनिवार्य है ही साथ ही समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है।
जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म, पहला जन्म माँ के गर्भ से होता है।
लडकियों को केवल उन परिस्थितियों में जनेऊ धारण करने का अधिकार है यदि वे आजीवन ब्रम्हचर्य का पालन करना चाहती हो।
जनेऊ धारण करने की आयु ( Janeu Dharan karne ki age)
धर्म शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण के पुत्र को 7 वर्ष में क्षेत्रीय के पुत्र को 11 वर्ष में और वैश्य के बालक को 13 वर्ष के पूर्व यह उपनयन संस्कार हो जाना चाहिए और यदि नहीं हुआ है तो किसी भी परिस्थिति में विवाह योग्य आयु के पूर्व अवश्य हो जाना चाहिए।
जनेऊ या यज्ञोपवित के नियम
जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं जो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक भी माने गए है साथ ही यह सत्व, रज और तम केे प्रतीक भी माने गए है। यह तीन सूत्र गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक और यह तीन आश्रमों का प्रतीक भी है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।
जनेऊ या यज्ञोपवित के एक तार में होते है 9-9 तार
यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वार मिलाकर कुल नौ द्वार शरीर में होते हैं।
जनेऊ या यज्ञोपवित मे लगायी जाती है पांच गांठ
यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। इन्हें पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का प्रतीक भी माना जाता है।
जनेऊ या यज्ञोपवित की लंबाई (Janeu ki Lambayi)
यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि शामिल हैं।
जनेऊ या यज्ञोपवित में कितने धागे होते हैं
शास्त्रों के अनुसार यज्ञोपवित में 6 धागे होते हैं जिनमें तीन धागे स्वयं धारण करने वाले के और तीन धागे पत्नी के बताए गए हैं। ब्रह्मचारी व्यक्ति और अविवाहित व्यक्ति की जनेऊ में तीन धागे ही होते हैं।
कौन कौन पहन सकते है जनेऊ और क्या लडकिया पहन सकती है जनेऊ
वैदिक धर्म में प्रत्येक आर्य(हिन्दू) का कर्तव्य है कि वह जनेऊ पहने और उसके नियमों का पालन करे। प्रत्येक आर्य (हिन्दू) जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।
ब्राह्मण को जनेऊ धारण करना अनिवार्य है ही साथ ही समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है।
जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म, पहला जन्म माँ के गर्भ से होता है।
लडकियों को केवल उन परिस्थितियों में जनेऊ धारण करने का अधिकार है यदि वे आजीवन ब्रम्हचर्य का पालन करना चाहती हो।
जनेऊ धारण करने की आयु ( Janeu Dharan karne ki age)
धर्म शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण के पुत्र को 7 वर्ष में क्षेत्रीय के पुत्र को 11 वर्ष में और वैश्य के बालक को 13 वर्ष के पूर्व यह उपनयन संस्कार हो जाना चाहिए और यदि नहीं हुआ है तो किसी भी परिस्थिति में विवाह योग्य आयु के पूर्व अवश्य हो जाना चाहिए।
जनेऊ या यज्ञोपवित के नियम
- यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।
- यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित यज्ञोपवीत शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
- जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है।
- यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित करना चाहिए ।
- मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।
- जनेऊ धारण करने वाला व्यक्ति मल मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा कर ही वह मल मूत्र विसर्जन करता है जिसके बाद वह अपने हाथों को और स्वयं को स्वच्छ करके ही जनेऊ कांस्य उतारता है यानी कि जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति स्वच्छता का पूर्ण रुप से ध्यान रखता है जिससे उसको इंफेक्शन आदि का खतरा कम हो जाता है।
- चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।
- वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
- कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
- कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।
- माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।
- यज्ञोपवीत धारण करना यानी हवन करने का अधिकार प्राप्त करना है वही उपनयन यानी की ज्ञान के नेत्रों का प्राप्त हो जाना
- जनेऊ धारण करने से आयु बल और बुद्धि में वृद्धि होती है वही पूर्व जन्मों के बुरे कर्म समाप्त हो जाते हैं
- जनेऊ धारण करने से शुद्ध चरित्र जप तप व्रत की प्रेरणा मिलती है वही नैतिकता एवं मानवता के पुण्य कर्तव्यों को पूर्ण करने का आत्मबल भी मिलता है
- जनेऊ के दिन धागे माता पिता की सेवा गुरु भक्ति का कर्तव्य बोध एवं भगवान की भक्ति का ज्ञान कराते हैं
- यज्ञोपवीत के तीन भागों में 9 तार होते हैं जिन्हें धारण करने से नौ ग्रह प्रसन्न रहते हैं।
- जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर रहने लगता है।

Nice
ReplyDeleteअति सुन्दर
ReplyDeleteअति सुन्दर
ReplyDeleteअति सुन्दर
ReplyDeleteBahut sundar
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